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Jai Singh Ek Purani katha

Ek Purani katha

एक पुरानी कथा इस समय के लिए आज भी बिल्कुल प्रासंगिक है....... 

एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने उन्होने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और उन्होंने अपने गुरुदेव एवं अपने मित्र देश के राजाओं को भी आदर सादर आमन्त्रित किया । उन्होंने उत्सव को बेहद रोचक और शानदार बनाने के लिए अपने राज्य की सुन्दर और सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।

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राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है, वरना राजा का क्या भरोसा दंड दे दे। तो उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक *दोहा* पढ़ा :-

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"बहु बीती,थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई। 

एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए||"

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और अब इस ##दोहे पर दरबार में उपस्थित सभी व्यक्तियों ने अपनी-अपनी सोच और बुद्धि के अनुरुप अपना अलग-अलग मतलब निकाला। तभी वह तबले वाला सतर्क और होसियार होकर तुरंत तबला बजाने लगा।

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और जब यह दोहा  #गुरु_जी ने सुना तो गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को अर्पण कर दी।

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दोहा सुनते ही राजा की लड़की ने भी अपना #नौलखा_हार नर्तकी को भेंट कर दिया।

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#दोहा सुनते ही राजा के पुत्र #युवराज ने भी अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।

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राजा बहुत ही अचम्भित हो गया।

सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है पर यह क्या! अचानक #एक_दोहे से सब अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुश हो कर नर्तकी को समर्पित कर रहें हैं , 

 #राजा सिंहासन से उठा और नर्तकी को बोला #एक_दोहे द्वारा एक सामान्य नर्तिका  होकर तुमने सबको लूट लिया ।"

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जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा ! इसको #नीच_नर्तकी मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है क्योंकि इसने दोहे से मेरी आँखें खोल दी हैं।दोहे से यह कह रही है कि मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई ! मैं तो चला।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।

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#राजा_की_लड़की ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे तो आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस #नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दे दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?" 

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तभी वहा युवराज जी ने कहा - " हे प्रिये पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज सिंहासन नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस #नर्तकी के दोहे ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख ।"

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जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक सुन्दर, सुशील राजकुमार आये हुए हैं।तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब कुछ त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।

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यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ? " और वहा उसी समय पर तुरंत ही वहा की नर्तकी में भी एक बिचित्र वैराग्य का समानँव आ गया और उसने तभी उसी समय पर ही तुरंत एक निस्चय कर एक निर्णय अपने लिए तुरंत ही बिना सोचे समझे ले लिया कि अब आज से और अभी से ही मैं अपना बेहद बुरा और बेहद ख़राब नृत्य हमेशा के लिए बन्द करती हूँ और उसने बोला और कहा कि "हे मेरे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा ही  सुमिरन करुँगी ।"

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई । 

एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए।"

 आज हम इस दोहे को यदि हम  कोरोना को लेकर अपनी समीक्षा करके देखे तो हमने पिछले 22 तारीख से जो संयम बरता, परेशानियां झेली ऐसा न हो कि हमारी अंतिम क्षण में एक छोटी सी भूल, हमारी लापरवाही, हमारे साथ पूरे समाज को न ले बैठे।

आओ हम सब मिलकर कोरोना से संघर्ष करे , #घर_पर_रहे, #सुरक्षित_रहे व सावधानियों का विशेष ध्यान रखें।

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